मैं तुझे गाना चाहता हूँ
गुनगुनाना चाहता हूँ
बस..........
ज़रा कंठ सध जाये
ताल बैठ जाये
सुर लग जाये
और
मूड बन जाये
ज़िन्दगी !
ओ ज़िन्दगी !
गीत हों न हों
गीतकार का दर्द तो है
संगीत हो न हो
सांस की झंकार तो है
मैं गा लूँगा
इत्ते भर से गा लूँगा
बस............
ज़रा कंठ सध जाये
ताल बैठ जाये
सुर लग जाये
और
मूड बन जाये

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विद्वजनों ने कहा है :
भोजन आधा पेट कर, दुगुना पानी पी
तिगुना श्रम,चौगुनी हँसी, वर्ष सवासौ जी
______हँसो हँसाओ ..मौज मनाओ ..........

गुलामी
पूर्ण अन्याय की एक व्यवस्था है
और दुनिया का
सबसे घृणित पाप है
मनुष्य का जीवन
इसलिए है
कि वह
अत्याचार के खिलाफ लड़े
- नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
मशक्कत
मेरा तेवर है
ज़ुर्रत
मेरा ज़ेवर है
मैं इन्हें बदरंग नहीं होने दूंगा
प्रयास
लाख असफल हों
मेरे
पर
उत्साह भंग नहीं होने दूंगा
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कुछ ही दिनों का
मेहमान है ये पतझड़,
देखो आने वाली है बहार मेरे देश में
शीतल हवायें और
मादक फिजायें बन्धु
झूम-झूम गायेंगी मल्हार मेरे देश में
कितना सुकून, कितना
आनन्द होगा जब
खुशियों के फूटेंगे अनार मेरे देश में
सुख की सरिता में
कमल पे सवार माता
शारदा बजायेगी सितार मेरे मेरे देश में
-------------------वैसे तो शारदा माता वीणा बजाती हैं
लेकिन उनका मूड हो तो सितार क्या गिटार भी
बजा सकती हैं ..हा हा हा हा
रात ये
मधुरात सी
मधुरात सी
बारात सी
बारात सी
बरसात सी
बरसात सी
जज़्बात सी
जज़्बात सी
उत्पात सी
उत्पात सी
आघात सी
आघात सी
हालात सी
_____हालात तुम बिन क्या हुए हैं देख लो...........
_____क्या थे, क्या हम हो गए हैं देख लो...........
देख लो इक बार आकर आशियाना
फिर तुम्हारा जी करे तो लौट जाना
लौट जाना इस तरह कि टूट जाए हर सगाई
तू अगर राज़ी है इसमे, मेरी भी इसमे रज़ाई
मेरी भी इसमे रज़ाई
मेरी भी इसमे रज़ाई
मेरी भी इसमे रज़ाई
ग्रहण ?
ये ग्रहण था ?
अगर था
तो बड़ा ही टुच्चा ग्रहण था
जो यूँ लगा और यूँ उतर गया
कोई निशां नहीं, किधर गया
लेकिन
दिन भर बवाल मचा रखा था
सारी दुनिया को नचा रखा था
समाचार वालो ने !
ज्योतिष वालो ने !
अरे !
ग्रहण ग्रहण क्या चिल्लाते हो ?
ग्रहण तो लगे ही हुए हैं हमारी ज़िन्दगी में
लगातार
लेकिन आपको दिखते नहीं हैं
इसलिए आप लिखते नहीं हैं
देखो !
गिनो !
कितने ग्रहण लगे हैं .........
त्यौहारों पर तनाव का
सम्बन्धों में दुराव का
भाषा पर अलगाव का
नदियों पर टकराव का
खेतों में सूखे का देखो, बस्तियों में बाढ़ का
मुआवज़े के मांस पे नेताओं की ख़ूनी दाढ़ का
दूध में मिलावट का तो राशन पर महंगाई का
अस्पतालों के बाहर बिकती नकली दवाई का
कितने ?
कितने ग्रहण लगे हैं हम पर........
पर तुम्हें दिखाई न देंगे.........
क्योंकि वहाँ केवल संघर्ष है, सनसनी नहीं है
बस मन है रोता हुआ, वहां हवाई मनी नहीं है
-अलबेला खत्री