बुधवार, 11 नवंबर 2009

मैं इन्हें बदरंग नहीं होने दूंगा........



मशक्कत


मेरा तेवर है


ज़ुर्रत

मेरा ज़ेवर है


मैं इन्हें बदरंग नहीं होने दूंगा


प्रयास

लाख असफल हों

मेरे



पर

उत्साह भंग नहीं होने दूंगा


मंगलवार, 10 नवंबर 2009

एक छोरी बावरी सी मेरे गीतों की फ़ैन हो गई



एक
गोरी सांवरी सी मेरे गीतों की फ़ैन हो गई
एक छोरी बावरी सी मेरे गीतों की फ़ैन हो गई

पनघट जाती-जाती गाए
जल भर लाती-लाती गाए

आती गाए, जाती गाए
सखियों से बतियाती जाए

पल में सौ बल खाती जाए
गीत वो मेरे गाती जाए

कितनी बेचैन हो गई, कितनी बेचैन हो गई ...
रे मेरे गीतों की ....


उसकी छैल छबीली आँखें
चंचल आँखें , कटीली आँखें

बिजली सी चमकीली आँखें
मोटी-मोटी मछीली आँखें

नीली और नशीली आँखें
आबे-हया से गीली आँखें

तीर्थ उज्जैन हो गईं, तीर्थ उज्जैन हो गईं ...
रे मेरे गीतों की ...


जब जब मेरी याद सताये
उसकी मोहब्बत अश्क़ बहाये

तन घबराये, मन घबराये
उसका अखिल यौवन घबराये

जग-जग सारी रैन बिताये
पल दो पल भी नींद न आये

रातें कुनैन हो गईं, उसकी रातें कुनैन हो गईं
रे मेरे गीतों की ...



सोमवार, 9 नवंबर 2009

तुम्हारी याद आती है, तो लाखों दीप जलते हैं............



पवन
जब गुनगुनाती है, तुम्हारी याद आती है


घटा घनघोर छाती है, तुम्हारी याद आती है

बर्क़ जब कड़कडाती हैं, तुम्हारी याद आती है

कि जब बरसात आती है, तुम्हारी याद आती है




तुम्हारी याद आती है, तो लाखों दीप जलते हैं

मेरी चाहत के मधुबन में हज़ारों फूल खिलते हैं

इन आँखों में कई सपने, कई अरमां मचलते हैं

तुम्हारी याद आती है तो तन के तार हिलते हैं


रविवार, 8 नवंबर 2009

इसमें दो राय नहीं है, पिता का कोई पर्याय नहीं है...



जिनसे

यह देह मिली

देह
को दुलार मिला

शक्ति मिली,

संवर्धन और विस्तार मिला


जीवन मिला

जीवन के पौधे को

नैतिकता
का संचार मिला

श्रमशील

और

स्वाभिमानी
रहने का संस्कार मिला


प्यार मिला

दुलार मिला

घर मिला

परिवार मिला

समाज मिला .........संसार मिला


वो सब मिला बिन मांगे,

जो मुझे मांगना भी नहीं आता था

मुझे तब चलना सिखाया

....जब रेंगना भी नहीं आता था


मैं नहीं भूला कुछ भी

न आपको

न आपकी सौगात को

न उस काली रात को

जब आप चिरनिद्रा में सो गए

जिस का रात-दिन स्मरण करते थे

उसी परमपिता के हो गये


छोड़ गये

तोड़ गये

सब
बन्धन घर-परिवार के

देह के और दैहीय संसार के


काश! आज आप होते

तो मैं इतना तन्हा न होता ..............


सच है

पूर्ण सच है ....

इसमें कोई भी दो राय नहीं है

पिता का कोई पर्याय नहीं है

पिता का कोई पर्याय नहीं है


मैं नहीं जानता

पुनर्जन्म
होगा या नहीं

हुआ भी तो

मानवदेह
मिलेगा या नहीं


परन्तु

प्रार्थना नित यही करता हूँ

एक बार नहीं,

बार बार ऐसा हो, हर बार ऐसा हो

मैं रहूँ पुत्र और

आप
! हाँ .....आप ही मेरे पिता हो


आप ही आराध्य मेरे

आप ही हैं देवता

कृतज्ञता !

कृतज्ञता !

कृतज्ञता !


-अलबेला खत्री



शनिवार, 7 नवंबर 2009

काश ! मैं भी दीया होता..आरती का नहीं तो अर्थी का सही..



दीया


आरती का हो या अर्थी का


दोनों

अन्धेरा छाँटते हैं

उजाला बाँटते हैं


लेकिन विनम्रता देखिये दोनों की


न तो कोई किसी पे हँसता है

न ही कोई व्यंग्य कसता है

न कोई वाद करते हैं, न ही विवाद करते हैं

दीये बस रौशनी का जहाँ आबाद करते हैं



इनमें शायद हीरो बनने का कोई

झगड़ा नहीं है


इसीलिए दीयागीरी में TRP का

लफड़ा नहीं है


बस काम करते हैं अपना अपना

आखरी दम तक


खपा देते हैं ख़ुद को............

बे-गरज़

ये बेजान दीये


कभी

आरजू - ए - इनाम नहीं करते



जबकि हम जानदार

आलम फ़ाज़ल

इन्सान


बिना गरज़ के

कभी कोई भी काम नहीं करते


__________कदाचित इसीलिए



हमें बार बार मरने को

बार बार ज़िन्दा होना पड़ता है


छोटी छोटी दुनियावी बातों पर

बारहा शर्मिन्दा होना पड़ता है



मुझे भी भ्रम है कि मैं

अपने फ़न-ओ-हुनर से

उजाला बांटता हूँ


जबकि सच तो ये है कि

अपने वजूद के लिए

औरों को काटता हूँ



छि: शर्म आती है अपनी ही सोच पर

इन्सानियत को खा गया हूँ नोच कर


काश ! मैं भी दीया होता......

आरती का न सही

अर्थी का ही सही.........................


- अलबेला खत्री





अपनी लाज बचाने के लिये आत्मघात कर रही हैं




( सूरत में घटी एक शर्मनाक घटना पर )


पत्तियाँ


गुलाब

की

कुछ

यूँ

झर

रही

हैं



मानो

कमसिन

किशोरियां

अपनी

लाज

बचाने

के

लिए

आत्मघात

कर

रही

हैं

-अलबेला खत्री

शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

रात बहुत लम्बी है लेकिन कट ही जायेगी .........


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी



सन्नाटे के सीने में तूफ़ान छिपा है

दर्द के दिल में खुशियों का सामान छिपा है


अंधियारे के आँचल से सूरज निकलेगा

काँटों के साए में फिर से फूल खिलेगा

रात बहुत लम्बी है लेकिन कट ही जायेगी

फिर सुबह आएगी........

फिर सुबह आएगी........


अलबेला खत्री