मंगलवार, 12 जनवरी 2010

भूतपूर्व भाजपाईजी के नाम कुछ अभूतपूर्व काइकू




किताब लिखो

पर ज़रूरी नहीं

ख़राब लिखो



ख़राब लिखो

पर किसने कहा

किताब लिखो



कमाल किया

किताब नहीं लिखी

बवाल किया



एहसास है ?

भूगोल नहीं है ये

इतिहास है



इतिहास में

छेड़ नहीं करते

परिहास में



जस ले बैठे

तरने की चाह में

बस ले बैठे




पारा गिरा है ?


ना रे ना भाजपा का

तारा गिरा है



राजधानी में

गिर गई उनकी

भैंस पानी में



सियासी एडो !

भूत बन जाओगे

जिन्न ना छेड़ो


-अलबेला खत्री




शनिवार, 9 जनवरी 2010

करगिल शहीदों के सम्मान में तिरंगे की भावाभिव्यक्ति पर अलबेला खत्री के शब्दों को स्वर दिया साधना सरगम ने...

जब कभी दुनिया में ख़ुद को तन्हा पाओगी प्रिये !




आपके भी होंठ इक दिन,

गीत गायेंगे मेरे

नींद होगी आपकी पर

ख्वाब आयेंगे मेरे


आपके भी...


जागेगी जिस दम जवानी, जिस्म लेगा करवटें

रात भर तड़पोगी, बिस्तर पर पड़ेंगी सलवटें

आँखें होंगी आपकी पर

आँसू आयेंगे मेरे

आपके भी...



जब कभी दर्पण में देखोगी ये कुन्दन सा बदन

ख़ूब इतराओगी इस मासूमियत पर मन ही मन

मद तो होगा आप पे, पग

डगमगायेंगे मेरे


आपके भी...



राह चलते आपको गर लग गई ठोकर कभी

ख़ाक़ कर दूंगा जला कर, राह के पत्थर सभी

पांव होंगे आपके पर

घाव पायेंगे मेरे


आपके भी...



जब कभी दुनिया में ख़ुद को तन्हा पाओगी प्रिये

जब शबे-फुर्कत में दिल मचलेगी साथी के लिए

आप अपने आप को तब

पास पायेंगे मेरे



आपके भी...



गुरुवार, 7 जनवरी 2010

जीने की जो चाह है तो मौत से भी नेह कर




रात न ढले तो कभी



भोर नहीं होती बन्धु


सांझ न ढले तो कभी तम नहीं होता है




लोहू तो निकाल सकता


तेरे पाँव में से


कांच से मगर घाव कम नहीं होता है




जीने की जो चाह है तो


मौत से भी नेह कर


डरते हैं वो ही जिनमें दम नहीं होता है




सच मानो जब तक


पीर का काग़ज़ न हो


कवि की कलम का जनम नहीं होता है




बुधवार, 6 जनवरी 2010

गुरूपर्व के परम पावन अवसर पर हिन्दू और हिन्दूत्व के रक्षक दशमेश श्री गुरु गोबिन्दसिंहजी के श्रीचरणों में..




जिकर आफ़ाक़ न हुन्दा,

तां धरती दा बिन्दू किंवें होन्दा ?


जिकर होन्दा न अक्खां विच पाणी,

तां फेर सिन्धु किंवें होन्दा ?


हिन्दू अते सिक्ख विच फ़र्क करण वालयो ,

तवारीख कैन्दी


जिकर सिक्ख न होन्दा,

तां फेर हिन्दू हिन्दू किंवें होन्दा ?




शनिवार, 2 जनवरी 2010

अमृत पी ज़हर उगलता है आदमी




शूलों से जो डर-डर

चलता है आदमी तो

पांव नीचे फूलों को मसलता है आदमी


अन्न जैसे कंचन को

कूड़ा कर फैंकता है

अमृत पी ज़हर उगलता है आदमी


जाने किस बात की

अकड़ है जो ऐंठ -ऐंठ

दो-दो फीट ज़मीं से उछलता है आदमी


गौर से जो देखा बन्धु

मुझे ऐसा लगा जैसे

अपनी ही आग में उबलता है आदमी



शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

कृतज्ञता ! कृतज्ञता ! कृतज्ञता !




जिन
से

यह देह मिली

देह को

स्नेह दुलार और विस्तार मिला


जीवन मिला

जीवन के पौधे नैतिकता का संचार मिला

श्रमशील और स्वाभिमानी रहने का संस्कार मिला


प्यार मिला

दुलार मिला

घर मिला

परिवार मिला

समाज
मिला .........संसार मिला


वो सब मिला बिन मांगे,

जो मुझे मांगना भी नहीं आता था

मुझे तब चलना सिखाया ....

जब रेंगना भी नहीं आता था

मैं नहीं भूला कुछ भी

आपको

आपकी सौगात को

उस काली रात को

जब आप चिरनिद्रा में सो गये

जिस का रात-दिन स्मरण करते थे

उसी परमपिता के हो गये

छोड़ गये

तोड़ गये सब बन्धन घर-परिवार के

देह के और दैहीय संसार के


काश! आज आप होते

तो मैं इतना तन्हा होता ..............

सच है

पूर्ण सच है ....

इसमें किसी को दो राय नहीं है

पिता का कोई पर्याय नहीं है

पिता का कोई पर्याय नहीं है


मैं नहीं जानता पुनर्जन्म होगा या नहीं

हुआ भी तो मानवदेह मिलेगा या नहीं

परन्तु

प्रार्थना नित यही करता हूँ

एक बार नहीं, बार बार ऐसा हो, हर बार ऐसा हो

मैं रहूँ पुत्र और आप ! हाँ .....आप ही मेरे पिता हो


आप ही आराध्य मेरे

आप ही हैं देवता

कृतज्ञता !

कृतज्ञता !

कृतज्ञता !