मंगलवार, 7 सितंबर 2010

देस की ख़ुशबू बसी है उसके हैप्पी होम में, ओम हैं उसमे बसे और वो बसी है ओम में




सुप्रसिद्ध कवयित्री, कथाकार, उपन्यासकार एवं अभिनेत्री

डॉ सुधा ओम ढींगरा के जन्म दिवस पर

रचित एक आत्मिक रचना



करुणा उसका शाश्वत स्वभाव है

पिता के आदर्शों का गहरा प्रभाव है


सम्वेदना सदैव शोणित में बहती है

सचाई उसके सपनों तक में रहती है


जनेता के आँचल का अनमोल मोती है

ऐसी बेटियां अपनी माँ का प्रतिरूप होती हैं


देस की ख़ुशबू बसी है उसके हैप्पी होम में

ओम हैं उसमे बसे और वो बसी है ओम में


सुख - समृद्धि - स्नेह से सुन्दर सजाये रास्ते

माँ से भी कुछ ज़्यादा माँ है वो विभु के वास्ते


मित्रता में वो कृष्ण से कम नहीं है

वो अगर है संग तो कुछ ग़म नहीं है


सुधा है नाम उसका, वो सुधा ही बांटती है

फूल बिखराती है जग में और कांटे छांटती है


शुभ घड़ी फिर उसके आँगन आज आई

जन्मदिन की 'अलबेला' लिखता बधाई

सोमवार, 6 सितंबर 2010

फिर नयी ऋतु में मिलेंगे




अब
बात रहने दो

जज़्बात बहने दो

टूट जाने दो किनारे

छूट जाने दो सहारे

डूब कर जी लें ज़रा सा

ये ज़हर पी लें ज़रा सा

ज़िन्दगी की शाम कर लें

कुछ घड़ी आराम कर लें

फिर नयी ऋतु में मिलेंगे

फिर नये गुलशन खिलेंगे

देह भी अब थक चुकी है

रूह भी तो पक चुकी है

वस्ल का एतमाद रखना

फिर मिलेंगे याद रखना

किसी ख़ुशनुमा मौसम में...........

किसी ख़ुशनुमा आलम में .........

शीराज़ा नाग अभी चारों तरफ़

लगी है आग अभी चारों तरफ़

इसे बुझ जाने दो

इसे बुझ जाने दो

इसे बुझ जाने दो

रविवार, 5 सितंबर 2010

इसलिए आज कविता नहीं, कोलाहल है




खरगोश
की उछाल

मृग की कुलांच

बाज़ की उड़ान

शावक की दहाड़

शबनम की चादर

गुलाब की महक

पीपल का पावित्र्य

तुलसी का आमृत्य

निम्बू की सनसनाहट

अशोक की लटपटाहट

_______ये सब अब कहाँ सूझते हैं कविता करते समय


अब तो

आदमी का ख़ून

बाज़ार की मंहगाई

खादी का भ्रष्टाचार

संसद का हंगामा

ग्लोबलवार्मिंग

प्रदूषण

और कन्याओं की भ्रूण हत्या ही हावी है मानस पटल पर


दृष्टि जहाँ तक जाती है,

हलाहल है

इसलिए आज कविता नहीं,

कोलाहल है





शनिवार, 22 मई 2010

जिस थाली में खाना उसी में छेद करना .......हमारी विशेषता है





चन्दा रे चन्दा !


ओ चन्दा !

किस से सीखा ये धन्धा ?

हम से ही

सीखा होगा शायद


क्योंकि हमारे अलावा तो कोई

यह विद्या

जानता नहीं


अगर

जानता भी है तो

मानता नहीं



जिस थाली में खाना

उसी में छेद करना .......हमारी विशेषता है

जिसे तूने खूब अपनाया है

और आज

एक बार फ़िर

अपने आका

सूरज को ग्रहण लगाया है


यह घटना तो कुछ पल की है

सूरज

जल्दी ही

तेरे पंजे से निकल जाएगा


लेकिन

ग्रहण का यह पल

इतिहास में

अंकित हो गया है

और तू

सदा सदा के लिए

कलंकित

हो गया है

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गुरुवार, 20 मई 2010

आज की रात जीना चाहता हूँ





आज
की रात जीना चाहता हूँ

आबे - हयात पीना चाहता हूँ


इससे पहले

कि मैं तुम्हारे हुस्न के झूले में झूल जाऊं


इससे पहले

कि मैं अपने मुर्शिद की दरगाह भूल जाऊं


हटालो निगाह मुझसे.................

ज़ख्म पहले ही बहुत गहरे है ज़िन्दगानी में

आज एक घाव सीना चाहता हूँ

आज की रात जीना चाहता हूँ



सिलवटें बिस्तर की पड़ी रहने दो..........

दुनियादारी की खाट खड़ी रहने दो

क्या ख़ाक मोहब्बत है, क्या राख जवानी है

लम्हों की कहानी है यारा, हर शै यहाँ फ़ानी है


फ़ानी को पाना क्या

फ़ानी को खोना क्या


फ़ानी पर हँसना क्या

फ़ानी पर रोना क्या


जो चढ़के उतरे

वो जाम मयस्सर है


महबूब ने जो भेजा

पैग़ाम मयस्सर है


सुराही, मीना चाहता हूँ

आज की रात जीना चाहता हूँ


आज की रात जीना चाहता हूँ


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बुधवार, 19 मई 2010

सिंगार बन तू ख़ल्क का तो खालिकी मिल जायेगी





अदावत नहीं



दावत की बात कर



अलगाव की नहीं

लगाव की बात कर



नफ़रत नहीं

तू

उल्फ़त की बात कर


बात कर रूमानियत की

मैं सुनूंगा


बात कर इन्सानियत की

मैं सुनूंगा


मैं न सुन पाऊंगा तेरी साज़िशें

रंजिशें औ खूं आलूदा काविशें


किसने सिखलाया तुझे संहार कर !

कौन कहता है कि पैदा खार कर !

रे मनुज तू मनुज सा व्यवहार कर !


आ प्यार कर

आ प्यार कर

आ प्यार कर


मनुहार कर

मनुहार कर

मनुहार कर


सिंगार बन तू ख़ल्क का तो खालिकी मिल जायेगी

ख़ूब कर खिदमत मुसलसल मालिकी मिल जायेगी

पर अगर लड़ता रहेगा रातदिन

दोज़ख में सड़ता रहेगा रातदिन


किसलिए आतंक है और मौत का सामान है

आईना तो देख, तू इन्सान है ..... इन्सान है


कर उजाला ज़िन्दगी में

दूर सब अन्धार कर !


बात मेरी मानले तू

जीत बाज़ी,हार कर !


प्यार कर रे ..प्यार कर रे ..प्यार कर रे ..प्यार कर !

प्यार में मनुहार कर ..रसधार कर ... उजियार कर !


- अलबेला खत्री















मंगलवार, 18 मई 2010

ब्लोगवाणी से सबकी यारी हिन्दी चिट्ठाकारी में




टिप्पणियों
की मारामारी हिन्दी चिट्ठाकारी में

लेखन पर टिप्पणियां भारी हिन्दी चिट्ठाकारी में


द्वेषपूर्ण जुमलेबाज़ी को ढेरों पाठक मिल जाते

तरस रही रचना बेचारी हिन्दी चिट्ठाकारी में


चिट्ठाजगत के सारे साधक करें मोहब्बत गूगल से

ब्लोगवाणी से सबकी यारी हिन्दी चिट्ठाकारी में


पुरूष यहाँ केवल पुरूषों के लिए नहीं पर

सिर्फ नारी के लिए है नारी हिन्दी चिट्ठाकारी में


केवल दो पंक्ति लिख कर ही हो हल्ला कर देते हैं

ऐसे ऐसे यहाँ मदारी हिन्दी चिट्ठाकारी में


मज़हबवादों, बकवादों, उन्मादों से बचना मुश्किल

चलती है तलवार दुधारी हिन्दी चिट्ठाकारी में


कभी कभी तो पोस्ट देखके सोच में मैं पड़ जाता हूँ

ये रचना है या बीमारी हिन्दी चिट्ठाकारी में


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