गुरुवार, 18 मार्च 2010

इत्ते भर से गा लूँगा





मैं तुझे गाना चाहता हूँ

गुनगुनाना चाहता हूँ

बस..........


ज़रा कंठ सध जाये

ताल बैठ जाये

सुर लग जाये

और

मूड बन जाये



ज़िन्दगी !

ज़िन्दगी !

गीत हों हों

गीतकार का दर्द तो है

संगीत हो हो

सांस की झंकार तो है



मैं गा लूँगा

इत्ते भर से गा लूँगा

बस............



ज़रा कंठ सध जाये

ताल बैठ जाये

सुर लग जाये

और

मूड बन जाये



















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बुधवार, 3 फ़रवरी 2010

हँसो हँसाओ ..मौज मनाओ ..........



विद्वजनों
ने कहा है :


भोजन आधा पेट कर, दुगुना पानी पी


तिगुना श्रम,चौगुनी हँसी, वर्ष सवासौ जी


______हँसो हँसाओ ..मौज मनाओ ..........






शनिवार, 23 जनवरी 2010

गुलामी दुनिया का सबसे घृणित पाप है -नेताजी



गुलामी

पूर्ण अन्याय की एक व्यवस्था है

और दुनिया का

सबसे घृणित पाप है



मनुष्य का जीवन

इसलिए है

कि वह

अत्याचार के खिलाफ लड़े



- नेताजी सुभाष चन्द्र बोस


गुरुवार, 21 जनवरी 2010

मेरा तेवर - मेरा ज़ेवर



मशक्कत


मेरा तेवर है


ज़ुर्रत

मेरा ज़ेवर है


मैं इन्हें बदरंग नहीं होने दूंगा


प्रयास

लाख असफल हों

मेरे



पर

उत्साह भंग नहीं होने दूंगा

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बुधवार, 20 जनवरी 2010

माता शारदा बजायेगी सितार मेरे मेरे देश में.......



कुछ ही दिनों का

मेहमान है ये पतझड़,

देखो आने वाली है बहार मेरे देश में



शीतल हवायें और

मादक फिजायें बन्धु

झूम-झूम गायेंगी मल्हार मेरे देश में



कितना सुकून, कितना

आनन्द होगा जब

खुशियों के फूटेंगे अनार मेरे देश में


सुख की सरिता में

कमल पे सवार माता

शारदा बजायेगी सितार मेरे मेरे देश में



-------------------वैसे तो शारदा माता वीणा बजाती हैं

लेकिन उनका मूड हो तो सितार क्या गिटार भी

बजा सकती हैं ..हा हा हा हा



रविवार, 17 जनवरी 2010

लौट जाना इस तरह कि टूट जाए हर सगाई..........




रात ये

मधुरात सी


मधुरात सी

बारात सी


बारात सी

बरसात सी


बरसात सी

जज़्बात सी


जज़्बात सी

उत्पात सी


उत्पात सी

आघात सी


आघात सी

हालात सी


_____हालात तुम बिन क्या हुए हैं देख लो...........

_____क्या थे, क्या हम हो गए हैं देख लो...........


देख लो इक बार कर आशियाना

फिर तुम्हारा जी करे तो लौट जाना


लौट जाना इस तरह कि टूट जाए हर सगाई

तू अगर राज़ी है इसमे, मेरी भी इसमे रज़ाई

मेरी भी इसमे रज़ाई

मेरी भी इसमे रज़ाई

मेरी भी इसमे रज़ाई






शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

बड़ा ही टुच्चा ग्रहण था



ग्रहण ?

ये ग्रहण था ?


अगर था

तो बड़ा ही टुच्चा ग्रहण था


जो यूँ लगा और यूँ उतर गया

कोई निशां नहीं, किधर गया


लेकिन

दिन भर बवाल मचा रखा था

सारी दुनिया को नचा रखा था

समाचार वालो ने !

ज्योतिष वालो ने !



अरे !

ग्रहण ग्रहण क्या चिल्लाते हो ?

ग्रहण तो लगे ही हुए हैं हमारी ज़िन्दगी में

लगातार

लेकिन आपको दिखते नहीं हैं

इसलिए आप लिखते नहीं हैं



देखो !

गिनो !

कितने ग्रहण लगे हैं .........


त्यौहारों पर तनाव का

सम्बन्धों में दुराव का

भाषा पर अलगाव का

नदियों पर टकराव का

खेतों में सूखे का देखो, बस्तियों में बाढ़ का

मुआवज़े के मांस पे नेताओं की ख़ूनी दाढ़ का

दूध में मिलावट का तो राशन पर महंगाई का

अस्पतालों के बाहर बिकती नकली दवाई का


कितने ?

कितने ग्रहण लगे हैं हम पर........


पर तुम्हें दिखाई देंगे.........

क्योंकि वहाँ केवल संघर्ष है, सनसनी नहीं है

बस मन है रोता हुआ, वहां हवाई मनी नहीं है



-अलबेला खत्री