रविवार, 15 नवंबर 2009

टूटना और बिखरना है बाकी अभी



अक़्स
--सावन उभरना है बाकी अभी

रुत का सजना, संवरना है बाकी अभी



उनकी क़ातिल अदाओं का दिल में मेरे

दशना बन के उतरना है बाकी अभी



उनकी गलियों से तो कल गुज़र आए हैं

अपनी हद से गुज़रना है बाकी अभी



उनके आने के झूठे भरम का दिल !

टूटना और बिखरना है बाकी अभी



जल्दबाजी कर 'अलबेला' इस कदर

उनका इज़हार करना है बाकी अभी


5 टिप्‍पणियां:

  1. जल्दबाजी न कर 'अलबेला' इस कदर
    उनका इज़हार करना है बाकी अभी
    सही है इज़हार तो कर लेने दीजिए. बहुत खूब

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  2. जल्दबाजी न कर 'अलबेला' इस कदर

    उनका इज़हार करना है बाकी अभी

    bahut sundar !

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  3. बहुत सुन्दर गज़ल!
    अन्धों को आइना दिखाती हुई!

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  4. जल्दबाजी न कर 'अलबेला' इस कदर
    उनका इज़हार करना है बाकी अभी॥
    उम्दा पंक्तियाँ! इंतज़ार का फल हमेशा मीठा होता है !

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  5. जल्दबाजी न कर 'अलबेला' इस कदर
    उनका इज़हार करना है बाकी अभी॥
    वाह वाह क्या खूब कहा है। शुभकामनायें

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