सोमवार, 6 सितंबर 2010

फिर नयी ऋतु में मिलेंगे




अब
बात रहने दो

जज़्बात बहने दो

टूट जाने दो किनारे

छूट जाने दो सहारे

डूब कर जी लें ज़रा सा

ये ज़हर पी लें ज़रा सा

ज़िन्दगी की शाम कर लें

कुछ घड़ी आराम कर लें

फिर नयी ऋतु में मिलेंगे

फिर नये गुलशन खिलेंगे

देह भी अब थक चुकी है

रूह भी तो पक चुकी है

वस्ल का एतमाद रखना

फिर मिलेंगे याद रखना

किसी ख़ुशनुमा मौसम में...........

किसी ख़ुशनुमा आलम में .........

शीराज़ा नाग अभी चारों तरफ़

लगी है आग अभी चारों तरफ़

इसे बुझ जाने दो

इसे बुझ जाने दो

इसे बुझ जाने दो

5 टिप्‍पणियां:

  1. एक अलग तरह की सुंदर रचना है ये आपकी कलम से

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  2. बहुत दिनो बाद एक पूरी कविता पढ्ने को मिली खत्री सहाब, वरना तो दो लायिनो मे ही टरका देते हो, सुन्दर !

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  3. मित्रवर बहुत दिनों बाद आपके ब्लॉग पर सुन्दर रचना पढने को मिली है!

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  4. वस्ल का एतमाद रखना

    फिर मिलेंगे याद रखना

    किसी ख़ुशनुमा मौसम में

    किसी ख़ुशनुमा आलम में
    बहुत सुन्दर रचना है। बस निश्ब्द हूँ। बधाई।

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