सोमवार, 14 दिसंबर 2009

क्योंकि मैं आज थोड़ा सुरूर में हूँ ..........




महक ये

उसी के मन की है

जो चली रही है

केश खोले


दहक ये

उसी बदन की है

जो दहका रही है

हौले हौले



महल मोहब्बत का आज सजा संवरा है

आग भड़कने का आज बहुत खतरा है


डर है कहीं आज

खुल जाए राज़


क्योंकि मैं आज थोड़ा सुरूर में हूँ

उसी की मोहब्बत के गुरूर में हूँ


जो है मेरा अपना...........

सदा सदा से ..........


मेरा मुर्शिद

मेरा राखा

मेरा पीर

मेरा रब

मेरा मालिक

मेरा सेठ

मेरा बिग बोस


वो आज उतरा है भीतर मेरी टोह लेने

मैं सहमा खड़ा हूँ फिर इम्तेहान देने


जानते हुए कि फिर रह जाऊंगा पास होने से

आम फिर महरूम रह जाएगा ख़ास होने से


लेकिन मन लापरवाह है

क्योंकि वो शहनशाह है


लहर आएगी, तो मेहर कर देगा

मुझे भी अपने नूर से भर देगा


मैं मुन्तज़िर रहूँ ये काफ़ी है

मैं मुन्तज़िर रहूँ ये काफ़ी है

मैं मुन्तज़िर रहूँ ये काफ़ी है




13 टिप्‍पणियां:

  1. कामना है कि ये सुरूर कायम रहे।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  2. सुरुर बना रहे...गुरुर जमा रहे!!

    जय हो!!

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  3. सभी सुरुरिया रहे हैं,
    मुझे तो लगता है आज दूऊऊऊऊऊऊर ही रहना ठीक होगा (:

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  4. वाह अलबेला भाई आपके इस सुरूर के तो क्या कहने ...

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  5. वाह अलबेला भाई,
    बहुत खूब, इस अभिव्यक्ति की बधाई,
    यह सरूर बना रहे..

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  6. महल मोहब्बत का आज सजा संवरा है
    आग भड़कने का आज बहुत खतरा है
    डर है कहीं आज
    खुल न जाए राज़
    क्योंकि मैं आज थोड़ा सुरूर में हूँ
    उसी की मोहब्बत के गुरूर में हूँ

    बस जी आप यूँ ही सरुर में रहा करो.....हमें तो राज़ खुलने का इन्तजार है .....!!

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